Sunday, 8 April 2018

पंजाबी कविता / जोगन / विपन गिल / अनुवाद - दर्शन दरवेश

उसने कहा
तुम कभी मत आना
इन दर दरवाज़ों पर
न जोगी बन
न भोग विलासी बन
जा किसी और दर पर जा
और अपनी अलख जगा
पर , मैं हूँ कि  ....
हर वर्ष आता हूँ
बारिश के भीगे मौसम में
पानी का तुपका बन
अलख जगाता हूँ
उसके घर आँगन में
जोगी बन
मस्ती मस्त नाचता हूँ
बैठ जाता हूँ जरा सा
उसकी हथेलियों पर
और छूह लेता हूँ
उसके बदन को
मन की महकती मिट्टी संग
और वो नाच उठती है
जोगन बन  ....
जोगन बन   ....... !

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पंजाबी कविता / जोगन / विपन गिल / अनुवाद - दर्शन दरवेश

उसने कहा तुम कभी मत आना इन दर दरवाज़ों पर न जोगी बन न भोग विलासी बन जा किसी और दर पर जा और अपनी अलख जगा पर , मैं हूँ कि  .... हर व...

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