Friday, 2 March 2018

पंजाबी कविता / सपने / दर्शन दरवेश - हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

सपनों पर किसी का हक़ नहीं होता
मुंडरों पर
बत्तियाँ बुझ जाती हैं
पानी का पर्वत बन जाता है
आँसू नीले हो जाते हैं
घने कोहरे में
पंछियों की आँख नहीं खुलती
कोई बिन बताए अंदर आ जाता है
पूछने पर कहता है –
सपनों पर किसी का हक़ नहीं होता
मैंने पहाड़ों में
समुंदर सिरज लिया
अपनी चुप का अँधेरा
बादलों के हवाले कर दिया
किसी के धुंधले अक्स को
कैनवस समझ लिया
गुलाब का चित्र बनाना था
पोहली1 के बीज छिड़क बैठा
पानी की लहर आई
उसकी आँखें खाली हो गईं
मेरी नज़र में
रेत भर गयी 
पानी दोनों के पास नहीं था
मैं दूर न जा सका
वह करीब न आ सका
कैनवस बोल रही थी
सपनों पर सचमुच किसी का हक़ नहीं होता !
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(1-कांटेदार पौधा)
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

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