Monday, 12 February 2018

"गाजर घास" / बलदेव कृष्ण शर्मा / अनुवाद - दर्शन दरवेश

"गाजर घास" / बलदेव कृष्ण शर्मा / अनुवाद - दर्शन दरवेश

मैं तेरे फ़लने फूलने पर
तुझे दाद देता हूँ
और विरोधी मौसम में,
जीने के हठ के लिए,
सलाम भी करता हूँ

बेशक,
ऋणात्मक पासार
कभी उपयोगी नहीं होते ,
लेकिन मुझे प्रभावित करता है
तेरा फलने फूलने पर आधारित
अपने उदेश्य के लिए
जीवित रहने का फलसफा


तेरा हठी स्वभाव
बहुत बड़ी शर्मिंदगी है,
नदीन नाशिकों के लिए

खेतों खलिहानों रास्तों में
जहाँ भी तेरे बीज गिरे हैं
तू वहीँ पैदा हो कर
फ़ैल गयी है

शायद,
तुम्हें नदीन कहना भी ठीक नहीं होगा
बेरहम नशीले पदार्थों के लिए,
तुझे अलग करता है
गिल्ली डंडा और इट सिट की श्रेणी से
क्योंकि वो भारतीय हो कर
अपनी फसलों का गला घोंटती हैं
और तुम
विदेशी हो कर
हमारी फसलों की नस्लों को मरती हो
और हम
तुम्हारी मेहमान नवाज़ी के लिए
पहले से ही,
आंखें झुका कर
आपका स्वागत करने की
आदत डाल चुके हैं
ये अलग बात है
तुम हमारा फायदा करती हो या नुकसान  .....?

                                                                          *****

(लेखक ज़िला  अमृतसर पंजाब में रहते है।  हर कविता मुद्दा प्रधान होती है।  नौकरी पेशा हैं।  बाकी  अपने बारे में वो खुद ज्यादा बता सकते हैं , अगर आप पूछोगे} 

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