Saturday, 20 January 2018

गुम हुआ घर / दर्शन दरवेश

दुनिया का मेला
और उस मेले में
एक गुम हुआ घर

कभी कभार
एक दर्द उठता है छाती में 
जब लोगों की भीड़
मिस्ठान की दुकानों
कबड्डी के मैच
बीर रस के क़िस्से
और
मिर्जा-साहिबां गाते
लोक गायकों की तरफ़ उमड़ पड़ती
धूल की एक धुंदली सी 
दीवार के उस पार
स्पष्ट नज़र आता है
तीस साल पहले बना एक घर
और मेरी मां

माँ ..
चली आ रही है
रोटी पर एक गुड़ रख कर
भीड़ में मुझे
उंगली पकड़ कर
चलने को कहती है
..
..
ना मैं भटका
ना मैं गुम होया
बस एक घर खो दिया है
उस मेले में मैं
जिसको आज भी तलाश रहा हूँ  ....
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