Sunday, 14 January 2018

चिट्ठीयां / स्वर्णजीत सवी / अनुवाद - दर्शन दरवेश

चिट्ठीयां   / स्वर्णजीत सवी

भोज पत्रों पर बैठकर
ताबीज़ में बंद संदेशे
कबूतरों के पाँव में बांधे
उनकी लम्बी उडारी
इंतज़ार करती आँखों को ठंडक पहुंचाती

चिट्ठियां सफ़र  करती
अँगुलियों की छोह संभाल कर
लाल डिब्बों में छिपकर
दूर दराज़ का सफ़र खंगालती
उत्सुक मनों को ठंडक पहुंचाती

टिक टिक करती
फिर से लिखती
मन की वेदना
दौड़ में शामिल
टेलीग्राम का जनम
अति ख़ुशी या फिर
गहरी उदासी बांटती

की बोर्ड पर पोटे लिखते
दिल की कहानी
सीधी  जाती
इनबॉक्स या ईमेल में

'हाय' 'हेलो' कहकर खुलती
चैट बॉक्स की खिड़कीयां
तुरंत मांगें जवाब
और पढ़ भी लें
आपके चेहरे के उतार चढाव  .....

भोज पत्तरों से चाट बॉक्स तक
चिट्ठियां तो चिट्ठीयां ही रहती हैं
कुछ रेशमी गरूर से भरी हुई
या बैठ जाएं
अंदर संदूकों (ट्रंक) के डायरी की तरह
या दिलों के अंदर
उनको संभलना तो
इनबॉक्स में ही है

कुछ वर्जित, चाहत से दूर
या
फिटकारी चिट्ठियां
कभी ना पार  करें
दिलों की दहलीज़

तीला  तीला  बिखर जाएं
ट्रैश स्पैम की गवाही भरवाकर
मिट जाएं हमेशा हमेशा के लिए
गुम  जाएं गहरे अँधेरे में

चिट्ठियां तो बस चिट्ठियां होती हैं
भोज पत्तरों पर हों या चैट  बॉक्स में  .....

(सवर्णजीत सवी पंजाबी का समान्तर शायर , चित्रकार , डिज़ाइनर , प्रकाशक , फोटोग्राफर है।  ) 

1 comment:

MY SONG

या खुदा / गुरप्रीत कौर

हाथों की अँगुलियों के छोर पर उकरी है कोई गाथा दिल की धड़कन में उठा है कोई बवाल फिर पैरों से सुनाई दी है घुंघरुओं की आवाज़ कानों को सुन...

MY POSTS