Thursday, 4 January 2018

नीलू हर्ष की 10 कविताएं / हिंदी अनुवाद - दर्शन दरवेश

NEELU HARSH

चल समंदर पे रेत का घर बनाएं 
तू छत पकड़ना 
मैं पांव नहीं निकालूंगी  
इस बार मत तोडना , कह देती हूँ 
घरौंदे नहीं बनते  .... मकान बन जाते हैं  .... 


ओ मुसाफिर 
मेरे शहर की आबो हवा में खुमारी है 
जब से 
तेरी खुशबु हवा ने चुरा ली है  ..... 


ओंस की बूँद , हाथ में तेरे 
सिर झुका कर चूमा 
रकीबों ने देखा और मेरी पलकों पर आ गयी  ..... 


हाथों से छूह कर उसे 
श्वासों में भर लिया 
रूह में घुल गया 
स्पर्श में उतर  गया  ... 


मौसम तेवर बदलता है 
हवा रुख बदलती है 
आज चमकती धुप है 
कल छाँव का सुख मिलेगा  ..... 


सारी  रात सुलगते तारे 
अब भी धीमी धीमी लो 
शायद चन्द्रमा को गुजरिश करते 
थोड़ा थोड़ा कुछ पल रुक जा और  ..... 


मन 
पहले मैं समझाती थी तुम्हें 
अब तुमने मुझे समझा लिया 
बस 
मैं हारी 
तुम जीत गए 
ये भेद मैंने पा लिया  ..... 


चमकती आँखों में 
कुछ नमी भी रखती हूँ 
उदासी का चन्द्रमा 
पूछ कर दस्तक नहीं देता  ..... 


मैं दरिया नहीं 
किनारा बनूँगी 
लहरों से खेलता मेरे तक आया 
फिर तो ठीक 
मुझे धकेल कर आगे बढ़ा 
ज़ालिम  .. बर्दाश्त ना  करूंगी  ..... 

10 
कभी तुम बने आदत मेरी 
कभी बेवजह शिरकत तेरी 
रिश्ता हो तो ऐसा ही हो 
ना रंज तुझे 
ना  मैं करूँ शिकायत तेरी  ..... 

(नीलू हर्ष पेशे से वकील है और सवभाव से ज़िंदादिल।  रुपनगर पंजाब में रहती हैं)

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