Saturday, 20 January 2018

गुम हुआ घर / दर्शन दरवेश

दुनिया का मेला
और उस मेले में
एक गुम हुआ घर

कभी कभार
एक दर्द उठता है छाती में 
जब लोगों की भीड़
मिस्ठान की दुकानों
कबड्डी के मैच
बीर रस के क़िस्से
और
मिर्जा-साहिबां गाते
लोक गायकों की तरफ़ उमड़ पड़ती
धूल की एक धुंदली सी 
दीवार के उस पार
स्पष्ट नज़र आता है
तीस साल पहले बना एक घर
और मेरी मां

माँ ..
चली आ रही है
रोटी पर एक गुड़ रख कर
भीड़ में मुझे
उंगली पकड़ कर
चलने को कहती है
..
..
ना मैं भटका
ना मैं गुम होया
बस एक घर खो दिया है
उस मेले में मैं
जिसको आज भी तलाश रहा हूँ  ....
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Sunday, 14 January 2018

चिट्ठीयां / स्वर्णजीत सवी / अनुवाद - दर्शन दरवेश

चिट्ठीयां   / स्वर्णजीत सवी

भोज पत्रों पर बैठकर
ताबीज़ में बंद संदेशे
कबूतरों के पाँव में बांधे
उनकी लम्बी उडारी
इंतज़ार करती आँखों को ठंडक पहुंचाती

चिट्ठियां सफ़र  करती
अँगुलियों की छोह संभाल कर
लाल डिब्बों में छिपकर
दूर दराज़ का सफ़र खंगालती
उत्सुक मनों को ठंडक पहुंचाती

टिक टिक करती
फिर से लिखती
मन की वेदना
दौड़ में शामिल
टेलीग्राम का जनम
अति ख़ुशी या फिर
गहरी उदासी बांटती

की बोर्ड पर पोटे लिखते
दिल की कहानी
सीधी  जाती
इनबॉक्स या ईमेल में

'हाय' 'हेलो' कहकर खुलती
चैट बॉक्स की खिड़कीयां
तुरंत मांगें जवाब
और पढ़ भी लें
आपके चेहरे के उतार चढाव  .....

भोज पत्तरों से चाट बॉक्स तक
चिट्ठियां तो चिट्ठीयां ही रहती हैं
कुछ रेशमी गरूर से भरी हुई
या बैठ जाएं
अंदर संदूकों (ट्रंक) के डायरी की तरह
या दिलों के अंदर
उनको संभलना तो
इनबॉक्स में ही है

कुछ वर्जित, चाहत से दूर
या
फिटकारी चिट्ठियां
कभी ना पार  करें
दिलों की दहलीज़

तीला  तीला  बिखर जाएं
ट्रैश स्पैम की गवाही भरवाकर
मिट जाएं हमेशा हमेशा के लिए
गुम  जाएं गहरे अँधेरे में

चिट्ठियां तो बस चिट्ठियां होती हैं
भोज पत्तरों पर हों या चैट  बॉक्स में  .....

(सवर्णजीत सवी पंजाबी का समान्तर शायर , चित्रकार , डिज़ाइनर , प्रकाशक , फोटोग्राफर है।  ) 

Thursday, 4 January 2018

नीलू हर्ष की 10 कविताएं / हिंदी अनुवाद - दर्शन दरवेश

NEELU HARSH

चल समंदर पे रेत का घर बनाएं 
तू छत पकड़ना 
मैं पांव नहीं निकालूंगी  
इस बार मत तोडना , कह देती हूँ 
घरौंदे नहीं बनते  .... मकान बन जाते हैं  .... 


ओ मुसाफिर 
मेरे शहर की आबो हवा में खुमारी है 
जब से 
तेरी खुशबु हवा ने चुरा ली है  ..... 


ओंस की बूँद , हाथ में तेरे 
सिर झुका कर चूमा 
रकीबों ने देखा और मेरी पलकों पर आ गयी  ..... 


हाथों से छूह कर उसे 
श्वासों में भर लिया 
रूह में घुल गया 
स्पर्श में उतर  गया  ... 


मौसम तेवर बदलता है 
हवा रुख बदलती है 
आज चमकती धुप है 
कल छाँव का सुख मिलेगा  ..... 


सारी  रात सुलगते तारे 
अब भी धीमी धीमी लो 
शायद चन्द्रमा को गुजरिश करते 
थोड़ा थोड़ा कुछ पल रुक जा और  ..... 


मन 
पहले मैं समझाती थी तुम्हें 
अब तुमने मुझे समझा लिया 
बस 
मैं हारी 
तुम जीत गए 
ये भेद मैंने पा लिया  ..... 


चमकती आँखों में 
कुछ नमी भी रखती हूँ 
उदासी का चन्द्रमा 
पूछ कर दस्तक नहीं देता  ..... 


मैं दरिया नहीं 
किनारा बनूँगी 
लहरों से खेलता मेरे तक आया 
फिर तो ठीक 
मुझे धकेल कर आगे बढ़ा 
ज़ालिम  .. बर्दाश्त ना  करूंगी  ..... 

10 
कभी तुम बने आदत मेरी 
कभी बेवजह शिरकत तेरी 
रिश्ता हो तो ऐसा ही हो 
ना रंज तुझे 
ना  मैं करूँ शिकायत तेरी  ..... 

(नीलू हर्ष पेशे से वकील है और सवभाव से ज़िंदादिल।  रुपनगर पंजाब में रहती हैं)

MY SONG

या खुदा / गुरप्रीत कौर

हाथों की अँगुलियों के छोर पर उकरी है कोई गाथा दिल की धड़कन में उठा है कोई बवाल फिर पैरों से सुनाई दी है घुंघरुओं की आवाज़ कानों को सुन...

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