Thursday, 21 December 2017

कलमदान में निचुड़ता शब्द - कंवलजीत भुल्लर / दर्शन दरवेश

कलमदान में निचुड़ता शब्द - कंवलजीत भुल्लर / दर्शन दरवेश

एक आवाज़ उदय होती है
अँधेरा थम जाने के बाद
एक दुआ सलाम होती है
सरहद के उस पार
सरहद के इस पार

कुछ कदम चलते हैं
शायरी के दरबार की ओर
वो गांव की बात बतियाता है
और
देश के नाम कर देता है
भरी हुई बंदूक
तब मैं आवाज़ लगता हूँ
कंवलजीत ......
इधर आ
कोई तेरी कविता सुनकर महक रही है
और एक चिड़िया
तुझे शब्द देने के लिए सहक रही है

जब भी मुझे मिलता है
सेक रहा होता है
अपने अंदर की धुप
खिड़की से चुराता है
पत्नी के हिस्से के सितारे
धीमी रौशनी से चुनता है
बच्चों के हिस्से का गुलाब
और
हवा को आवाज़ देकर कहता है
आ चिड़िया
उस टहनी पर बैठ जा
जो मेरी कविता सुनकर महक रही थी

आकाश की नीलिमा
मुक्ति का एहसास
गीली मिटटी की देह
भरा हुआ कुआँ
आरती का रंग
समंदर का शोर
और शायद  .....
अपने ही अँधेरे को
बर्दाश्त करने का नाम है
......  कंवलजीत  !
अपने ही कलमदान में
जब वो निचुड़ता है
तब
एक एक शब्द की किस्मत
हाथों की दुआ बनती है
बातों की अगन जलती है
गीतों की बांसुरी सुनती है
और मैं
उस कलमदान में
एक आंसू गिरता हूँ
और देखता हूँ
उसके शब्दों के परिंदों का जश्न
और मैं  .....
उसकी कविता की रखवाली करता हूँ  ...!

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