Monday, 4 February 2013

जीती गंगानगरिया उर्फ़ जगजीत सिंह

मुलाक़ात - सुखदर्शन सेखों 

                              (काश आज वो हमारे बीच होते !)

बचपन की गलिआं, उन में मौलती शरारतें, मस्तियाँ करते दोस्त मोहन, मोनी, केवल और सरदूल | इन सारे दोस्तों को साथ लेकर गोल गोल आँखों का नाच नचाता हुआ एक शरारती लड़का बिलकुल मेरे सामने आकर खड़ा हो जाता है- जीती | ये उसका घर का छोटा नाम था और जगह थी, राजस्थान के अंदर गंगानगर |
अब चलते हैं महाराष्ट्र में, वहां भी एक जगह है खंडाला | खंडाला में एक घर और उस घर के अंदर एक बगीचा | गीली मिट्टी में लिपटे हाथों से सवेर की सुनहरी धुप में फूलों की, पानी से प्यास बुझाता एक शख्श- जगजीत सिंह |
अमरीका का एक शहर फ्रेज्नो, जहाँ शाम को आखरी गजल सुनती है एक महफ़िल | शांत सुरमई नशे से भरी हुई लोगों की बहुत सारी भीड़ | इस भीड़ के हाथ उस संगीतक महफ़िल के नाएक  के पाँव पकड लेते हैं, और उनके होठों से आवाज़ निकलती है 'वनस मोर वनस मोर' | अक्सर ऐसे ही होता है | नाएक 'कभी फिर सही' का बहाना लगाना चाहता है, लेकिन भीड़ को कौन मनाये ?  नायक हाथ बांधता है लेकिन कोई भी फ़ायदा नहीं होता .. ..जवानी की दहलीज़ पर कदम रखकर चला जा रहा उनका एक बेटा है, मनपसंद काम है , पैसे हैं, पत्नी है, लेकिन एक दिन एक कार दुर्घटना हो जाती है .. ..सच्चे सपने जैसा उनका पुत्तर रेज़ा रेज़ा हो जाता है, वो जिसके लिए इतने बड़े घर की दीवारें खड़ी की थी , वो तो अब इन दीवारों का मेहमान रहा ही नहीं.. .. चित्रा (उनकी पत्नी) शब्द,सुर, संगीत और हिम्मत हार गयी है .. कदम मंच की और जाने से इनकारी हो गये हैं .. ..तबले की थाप के साथ साथ जैसे आंसू भी संगीत की संगत करने लग पड़े हैं, पीछे सिर्फ दर्द रह गया है ..और उस दर्द को ये भी नहीं पता के जाए तो जाए कहाँ ?
गजल तब भी गाई जाती थी| एक से बढकर एक फनकार होते थे. लेकिन वो गजल सुनने वालों को भारी लगती थी ,, जगजीत आया तो उसने आम आदमी की भाषा जैसी गजलों को चुना | अपनी चीस भरी आवाज़ में उनको गया | वो हर उस किसी के पास जाना चाहता था जो गजल का दीवानगी की हद तक दीवाना था.. और जब वो उनके पास गया तो दीवानों ने उनके कदम चूम लिए और कहा ..वाह !
वो शख्श जिसके बारे में मैं अब तक बोलता चला आया हूँ , एक दिन बिलकुल सफैद कुरते पाजामें में मेरे सामने बैठा था ..  जगजीत सिंह | पंजाबी लहजा, माखन जैसी मुलायम आवाज़, हम उनके दीवानखाने में, एक दुसरे के भीतर उतरने की कोशिश कर रहे थे.. और हमारे आस पास फैली थी अनहद शांति .. ..

-  इस बेहिसाब सफलता का क्या कारण मानते हो ?
जगजीत-  सफलता की पहली शर्त ये होती है कि जो काम आपने शुरू किया है, वो आपको आता भी है या नहीं ? उसके बाद शुरू होती है सख्त मेहनत, अगर आप अपनी मेहनत के लिए पूरी तरह से इमानदार हो फिर तो सफलता न मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता, हाँ सफलता की डिग्री अलग हो सकती है[ मैं पहले संगीतकार हूँ, फिर मैंने गजल को चुन लिया[ मैं कॉलेज के दिनों से ही स्टेज प्रोग्राम करता आया हूँ | इन सब में सफलता पाने के लिए मुझे उर्दू भी सीखना पड़ा | मैंने सारे तीर भत्थे में भरकर तयारी शुरू की , फिर तो मेरी मेहनत और किस्मत ने ही मेरा साथ निभाना था | मैं बहुत ही साधारण किस्म का बन्दा हूँ, न हंकार, न चालाकी, न ही फालतू का दिखावा |

- लेकिन जब आप सीख रहे थे , उस वक्त कभी सोचा था  कि इतनी सफलता भी मिलेगी ?
जगजीत- उस समय तो ये भी नहीं सोचा था कि संगीत को ही जिंदगी बना लूँगा; हाँ कभी कभी प्लेबैक सिंगर या संगीतकार बनने का सपना जरूर देखा करता था | हमारे वक्त में माता पिता ही तय करते थे के बच्चे ने क्या बनना है | वो मुझे आई ये एस करवाके बड़ा ऑफिसर बनाना चाहते थे |  मैंने आर्ट्स के साथ ग्रेजुएशन और हिस्ट्री के साथ एम् ए की लेकिन फिर मैंने फैसला कर लिया कि संगीत के मैदान में ही सब कुछ करना है और मैं 1965 में मुंबई आ गया | (8 फरबरी 1941 को जन्में जगजीत बचपन की गलिओं को कुरेदने लग गये, कैसे उन्होंने उस्ताद जमाल खान से संगीत सीखा, कैसे वो पहले पढने में होशयार होते थे बाद में कमजोर हो गये |

- आई ऐ एस बनने का विचार क्यों त्याग दिया ?
जगजीत- उस के लिए पढना पड़ता था, एक यही तो काम था जो करना नहीं आया |

- गजल को ही क्यों चुना ?
जगजीत- गजल की पोएट्री मुझे अच्छी लगती है |  इसमें मीटर है, शिश्त है | भजन या हिंदी कविता में कभी कभार ऐसा हो जाता है कि लाइन्स आउट ऑफ मीटर हो जाती हैं लेकिन गजल में ऐसा कभी नहीं होता |

- अच्छी गजल की तलाश कैसे करते हो ?
जगजीत- क़िताबें पढता हूँ | ग़ज़लकारों के संपर्क में रहता हूँ. देखता हूँ कि गजल कि भाषा मुश्किल नहीं होनी चाहिए | उसका विचार ऐसा हो कि कोई भी सुने और घर जाकर सोचने के लिए मजबूर हो जाए | हर किसी को ऐसा लगे कि इसमें तो मेरी जिंदगी का भी कोई हिस्सा है | मैं पहले रचना देखता हूँ और लिखने वाले का नाम बाद में |

- रिआज़ कितने घंटे करते हो ?
जगजीत- घडी देखकर कभी रिआज़ नहीं होता, बैठ गये तो फिर बैठ गये.. ..!

- गाने वाले फनकारों में कौन अंदर तक छूह लेता है ?
जगजीत- मेहंदी हसन, आमिर खां, तलत महमूद, लता बाई के पुराने गाने अच्छे लगते हैं | आज कल रशीद खां भी बहुत अच्छा गाने लग गए हैं | कोई एक प्यारा नहीं है | नए लोगों से उतना अच्छा नहीं आ रहा | सभी शोर्ट कट ढूँढ़ते हैं | वो सीखने से भागते हैं, मैं सीखने को भागता हूँ .....इतना ही अंतर है हम और उन में.....?

- घूमने के लिए कौन सी जगह अच्छी लगती है ?
जगजीत- यूरोप के शहरों में घूमना अच्छा लगता है | वहां आपको पुरानी संस्कृति , और इतिहास देखने को मिलता है | रोम, पेरू, इथोपिया बहुत कुछ संभाल कर बैठे हैं | बाकी गंगानगर की गलीआं और डी ए वी कॉलेज जन अच्छा लगता है |

- आपके सुनने वाले कैसे लोग हैं ?
जगजीत- पूछो न , गाने के लिए मूंह खुला नहीं कि साथ ही शुरू हो जाते हैं | मेरी गजलें मुझ से ज्यादा उनको याद हैं.. वो पूरे का पूरा गाना मेरे साथ गाते हैं, और सच कहूं तो यही लोग मेरी प्राप्ति हैं..वो स्टेज से उतरने ही नहीं देते |

- आपके ऊपर हमेशा ये दोष लता रहा है कि आप अपने शो हमेशा पांच तारा होटलों में ही करते है यहाँ आम आदमी जा नहीं पाता ?
जगजीत- मैंने कभी भी पर्बन्ध्कों को नहीं कहा कि ऐसा करो , वो तो जाकर ही पता चलता है कि मैं कहाँ गा हूँ..  ये मरी समस्या नहीं है.. मैं तो घरों कि महफिलों में भी गा लेता हूँ |

- आपका रोजनामचा कैसा है ?
जगजीत- जिंदगी.. संगीत के रास्ते में मिली सफलता और दर्द के काँटों कि चुभन के पुल के ऊपर से गुज़र रही है बस | अगर कहीं से फुर्सत मिलती है तो मैं स्पोर्ट्स चैनल देखता हूँ | टेनिस, रबी, हॉकी,फूटबल, बालीवाल | कॉमेडी चैनल और फ़िल्में देखकर फेफड़ों कि कसरत करता हूँ | अगर ज्यादा वक़्त मिलता है तो गाड़ी में कुल्फी या आइस क्रीम रखता हूँ और खंडाला चला जाता हूँ और वहां की बगीची कर अपनी उस दिन की मोहर लगता हूँ |

- आखिर संगीत ने आपको किया दिया है ?
जगजीत- बहुत कुछ.. .. पैसा, नाम, यार दोस्त, सकून, बाकी चीज़ों का मैं संगीत के साथ कोई बड़ा सम्बन्ध नहीं समझता | जिंदगी एक गोरखधंदा है जिसको हर किसी ने भुगतना ही है | इस पेशे में आप अपने मालिक आप होते हो | आपको 9 से 5 की ड्यूटी नहीं करनी पड़ती | हम लोग जितने भी कलाकार होते हैं मूड में जीते हैं मजबूरी में नहीं |

- क्या यही कारण है कि आपने फिल्मों में कम गाया है ?
जगजीत- ये सिर्फ एक वजह है, और भी कई कारण हैं | पहली बात तो यह है कि मेरी आवाज़ फिल्मों को जचती ही नहीं | सोबर आवाज़ में चीपनेस जचती ही नहीं है | मैं मोहम्मद रफ़ी कि तरह गाऊँ तो मेरी आवाज़ खराब हो जाती है | इसकी एक अपनी किस्म की रेंज है | दूसरा फिल्मों के लिए वक़्त भुत बर्बाद करना पड़ता है | वहां अंगुली करने वाले बहुत से होते हैं | अब संगीत विकता है | फिल्मों की पोजीशन बदल चुकी है | जैसा वहां है वैसा तो मैं गा ही नहीं सकता |

.. .. . और समय चलता चला गया .. ..मैं इंतज़ार कर रहा था कि कब बातें करते करते गजलों के कुछ अलफ़ाज़ तरेल तुप्कों कि तरह टपकने शुरू हो जाएँ .. .. दबे पांव छिड़ जाए कोई सुरों कि महफ़िल.... लेकिन मेरे हाथ कुछ भी नहीं लगा .. ..संगीत तो शायद रीआज़ की गलिओं में बंद था .. ..मैं और कहानिया सुनना चाहता था लेकिन समय की मनमानी को कौन आँखें दिखा सकता है .. .बाहर खड़ी गाडी ने आवाज़ लगा दी और जगजीत किसी शो के लिए रवाना हो गये .. .. बातें मेरा नसीब थी और शायरी किसी और का .. .. और मैं फिर कॉफ़ी की तरफ हो लिया, सोचता हुआ,.. .. तू नसीब है किसी और का , तुझे चाहता कोई और है.. ..!!!!!

9 comments:

  1. खूबसूरत तस्वीरों की यादों के साथ खूबसूरत अल्फाज़ से सजी दिल को कसीजती हुई लेखनी ....

    यूँ जग को जीतने वाले रब्ब के खास अज़ीज़ होते हैं ...
    जीत गए सबके दिलों को ....

    (आपकी किताब आ गई ...?)

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  2. comment box se word verification htaa lein ...!!

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  3. यह आवाज़ भुलाई नहीं जा सकती ...उनकी ध्वनि हमारे कानों में हमेशा गूंजती रहेगी !
    आपका आभार !

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  4. जगजीत सिंह हमेशा हमारे दिलों पर राज़ करते रहेंगे..

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  5. इस आवाज में ऐसी कशिश है ली भूल पाना मुश्किल है |सचित्र लेख बहुत अच्छा लगा |
    आशा

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  6. ਬਹੁਤ ਹੀ ਸੋਹਣੇ ਅੰਦਾਜ਼ 'ਚ ਦਿਲਕਸ਼ ਤਸਵੀਰਾਂ ਦੇ ਜ਼ਰੀਏ ਯਾਦਾਂ ਨੂੰ ਤਰੋ-ਤਾਜ਼ਾ ਕਰਦੀ ਪ੍ਰਭਾਵਸ਼ਾਲੀ ਲੇਖਣੀ।

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  7. इस आवाज़ पर तो मर मिटने को जी करता है...
    आभार इस पोस्ट के लिए.

    सादर
    अनु

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  8. काश आज वो हमारे बीच होते !
    ईश्वर का भेजा हुआ अवतार ही थे जगजीत सिंह जी...
    बुला लिया वापस !

    बातचीत बहुत रोचक है आदरणीय सुखदर्शन सेखों जी !
    पूरी पोस्ट और चित्रों के लिए आभार आपका !
    बहुत अच्छा लगा जान कर कि आप जगजीत सिंह जी के बचपन के मित्र रहे हैं ...

    उनके चले जाने पर कुछ पंक्तियां श्रद्धांजलि देते हुए कही थीं मैंने -
    ♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥
    जग जीतने की चाह ले’कर लोग सब आते यहां !
    जगजीत ज्यों जग जीत कर जग से गए कितने कहां ?
    जग जीतने वाले हुनर गुण से जिए तब नाम है !
    क्या ख़ूब फ़न से जी गए जगजीत सिंह सलाम है !!

    -राजेन्द्र स्वर्णकार
    ♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥♡♥


    हार्दिक मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  9. Mera artical pasand karne wale doston ka shukaria.

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!! एहसासों का सागर !!: जब चन्दा को मिली चाँदनी, पूरण चाँद कहाया।।

!! एहसासों का सागर !!: जब चन्दा को मिली चाँदनी, पूरण चाँद कहाया।।

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