Friday, 1 June 2012

गुलज़ार उर्फ़ सफेद समंदर

गुलज़ार की फिल्म देखी थी 'मौसम', लेकिन अब ऐसे लगता है कि उसका नाम सफेद मौसम होना चाहिए था | गुलज़ार  के स्वभाव जैसा, लेकिन एक दिन वो भी आ गया कि जिस  गुलज़ार को मिलने के लिए मैं पिछले कितने ही सालों से कोशिशें कर रहा था उसी गुलज़ार से से मेरा सामना उनकी फिल्म 'माचिस' के सेट पर हुआ | उनके साथ बहस करने के ख्याल का मुझे गला घोंटना पड़ गया | स्टूडियो था  फिल्म्स्तान और एरिया था मुंबई का गोरेगांव |  मैं सिनेमाटोग्राफर मनमोहन सिंह के साथ सहायक के तौर पर काम करता था और गुलज़ार साहब  उस जहाज के कप्तान थे | ये मेरी शुरुआत थी इस लिए मैं सीखता कम और फिल्म को बनते हुए ज्यादा देखता था | सुबह की नमस्कार के बाद सारा दिन उनके साथ किसी भी किस्म की कोई बात नहीं होती थी | वो अपना काम करते थे और मैं सारा दिन मूक दर्शक बना उनको देखता रहता था | 'माचिस' बन गयी, रिलीज़ हो गयी और मैं फिर से गुलज़ार साहब को मिलने के लिए तड़पने लगा |
फिर खबर आई कि गुलज़ार साहब दो और फ़िल्में बनानें जा रहे हैं, 'मजहब' और 'हु-तू-तू' | एक बार फिर मेरे चेहरे पर ख़ुशी का रंग उमड़ आया 'मजहब' तो खैर अभी तक नहीं बनी हाँ 'हु-तू-तू' की पूरी शूटिंग मैंने उनके साथ की | इस बार उनके साथ थोड़ी थोड़ी गुफ्तगू होनी भी शुरू हो गयी थी | और मैं था कि मौका पाते ही उस सफेद समन्दर से कुछ न कुछ निकालने लग जाता था |  मुझे अमृत नहीं चाहिए था लेकिन जो चाहिए था वो अमृत जैसा ही कुछ था |

हर समय सफेद वस्त्रों में लिपटा हुआ ये शख्स देश के बटवारे का इतना काला अँधेरा अपने भीतर समेट कर बैठा है जिसको अगर हम हिलाना शुरू कर दें तो सिसकीओं की आवाज़ों के इलावा कुछ भी सुनाई नहीं देगा हाँ कुछ दफ़न हुई आहें आप तक पहुँच जाएंगी |
गुलज़ार अपने बाप के दुसरे विवाह की इकलौती औलाद है | अभी वो एक साल का भी नहीं हुआ था कि कुदरत ने 'माँ' शब्द उसके होठों से छीन लिया था, इस लिए वो किसी को भी बता नहीं सकता कि माँ के नक्श कैसे होते हैं ?
ये सफेद समंदर १९४९(1949) में मुंबई आया था लेकिन उसने अपनी पहली फिल्म निर्देशित की थी १९६०(1960) के  आखिर में, नाम था 'मेरे अपने' |
गुलज़ार साहब से मेरी मुलाकातें बढ़ी तो जरूर लेकिन आहिस्ता आहिस्ता | वो शख्स भीतर से इतना भरा हुआ है कि उसको आधा अधूरा सोचा भी नहीं जा सकता | शाएरी और सिनेमा उस के लिए दो आँखों की तरह हो गये हैं जिनके बगैर वो जैसे चल फिर ही नहीं सकता |
गुलज़ार की एक मुश्किल हु-ब-हु मेरे साथ भी मिलती है कि निर्माता लोग जो कुछ उनसे बनवाना चाहते हैं उस के लिए सौ वार सोच कर हाँ कहनी पडती है और जो कुछ उनके पास है उसके लिए निर्माता नही मिलते | बिलकुल  ऐसी स्थिति में से मुझे भी अभी तक गुजरना पड़ रहा है मसलन अगर उन्होंने कृष्ण चन्द्र और मंटो सम्भाल कर रखे हुए हैं तो मैंने भी अमृता प्रीतम , दलीप कौर टिवाणा, गुरचरन चाहल भीखी, जसबीर भुल्लर, प्रेम प्रकाश और गुरपाल लिट्ट की कहानियां सम्भाल के रखी हुई हैं |
एक लगातार्ता का नाम है गुलज़ार | मैं गुलज़ार के लिए बोलना चाहता था | उनके साथ हुई मुलाकातों से जैसे वो तो सारे का सारा मेरे भीतर भी भर गया था, लेकिन न जाने क्यों मेरा अंदर मंच की तलाश के लिए मुनकर हो गया था | मैंने अपने ही शब्दों का मंच त्यार कर लिया और उस मंच से शब्दों की एक तस्वीर बन गयी | कैसी बनी है ये तो आप बताएँगे न ?

कौन है गुलज़ार
मैं नहीं जानता..
शायद कोई भी नहीं जानता ,
जिसने भी जाना है गुलज़ार को
शायद उसके चलचित्रों की मार्फत जाना है
उसकी शायरी सुनी है
अलग अलग आवाज़ों के दर्द में ..
उसके संवाद को सुना है
अदाकारों की अदायगी से
इतना सब कुछ देखते सुनते
और पर्दे के मंच ऊपर घुमते हुए भी
किसी ने नहीं जाना
कि कौन है .. .. गुलज़ार ?

शायद कोई भी नहीं जानता
कि बटवारे की लाल जमीन पर सिसकती
नज्मों का नसीब
पानी के ऊपर खीची गयी लकीर
सपनों की चाल चलती हवा
अपने ही दूध से
अपने ही किनारों को जला देने का नाम
हो सकता है .. .. गुलज़ार ..!

 शायद कोई भी नहीं जनता
पिघल कर कागजों पर फैली आग
खेतों में बोए अधनंगे चिहरे वाले बीज
पतझड़ में खुंदक कर लौटी आवाज़
ऊँची पहाड़ी पर हंसती हरिआवल
ठंडी हवा में सुनाई देने वाली
सीटी का नाम हो सकता है
               गुलज़ार .. ..

हो सकता है
कि कोई जनता भी हो
कि जब कभी अँधेरी रात में
लटकते हैं सुपने
चुन्नी के सितारों की तरह
जा बैठते हैं वो
समंदर की ठंडी छाती पर
और हो जाती है वो रात
किसी बच्चे के बचपन जैसी
और शोर मचाता है समंदर का पानी
किसी को मिलने के लिए
तो हो सकता है
कोई जानता भी हो
समंदर के घुस्मुसे में मिलने वाला
गुलज़ार ही हो सकता है.. ..

हो सकता है
कि कोई जानता भी हो
कि जिसकी आँखों में
उदासी तैरती है
आवाज़ में मुस्कान खेलती है
जिह्न कि ममटी उपर
इबारत बैठती है लिबास कि तरह
अपने उपर ओढ़ता है वो चांदनी
उस मिटटी के पेड़ को
लगे फल का नाम
सिर्फ और सिर्फ
गुलज़ार ही हो सकता है

हाँ
ये सब जानने वाला
और कोई नहीं मैं हूँ
सिर्फ और सिर्फ मैं.. ..
क्यों कि-
किसी को ये हक नहीं है
कि जो मैं जानूं
उसे कोई और भी जाने
क्यों कि मैं जनता हूँ
वो.. .. जो मेरा गुलज़ार है
हजारों नदिओं का विष पिया है जिसने
जिसके खून की गंध बन गयी है
सरस्वती . ..

शब्दों की रखवाली के लिए
पैदा हुआ है जो
आंसुओं की नमी वाला
कागज़ है वो
सपनों के पानी पर तैर कर
आसमान पर छिडकता है रंग
अपने आप से करता है
घने कोहरे जैसे संवाद
अपने जिस्म की आग से सेकता है
बीत गये सालों में
ठिठुरता हुआ इतिहास

आंसू संभालता है
ज़ख्मों को सीता है
हवा को भिगोता है
रातों को जागता है
ख्वाबों से लिपटता है
बातों को बुनता है
चुम्बन को जलाता है
दीयों को सुलता है
मेरा गुलज़ार है वो
सिर्फ मेरा गुलज़ार
ऐसा गुलज़ार मैं किसी का होने भी नहीं दूंगा

ऐसा गुलज़ार
मैं किसी को सोचने भी नहीं दूंगा

इतना मिल चुका हूँ मैं उनसे
कि शायद जरा सा भी नहीं मिला

दिल करता है
हर पल उनके साथ रहूँ
डर लगता है
फिर शायद वो मेरे पास नहीं रहेगा
या हो सकता है
वो सब से ज्यादा मेरे पास ही रहे

मेरे भी तो सपने हैं
उड़ सकता हूँ मैं भी
एक ही सपना है मेरा - गुलज़ार
एक ही उड़ान है मेरी - गुलज़ार
जिंदगी की डायरी का हर पन्ना
हो गया है शायद गुलज़ार के नाम
जिस उपर लिखता हूँ मैं सिर्फ
कुछ सुलगते सवाल ..
मौसम की वफादारी .. ..
मन का गुलाब .. ..
आँखों की जुबान .. ..
अम्बर के सितारे .. ..
चेहरे का इंतजार .. ..
और सिर्फ और सिर्फ
गुलज़ार .. .. गुलज़ार .. .. गुलज़ार .. ..

गुलज़ार तुम जिंदा रहो
आने वाले कल के लिए
जाती हुई लहर के लिए
सुलगते आसमान के लिए
जागते सपनो
और हंसती रौशनी के लिए
हवा के हाथों में अपना चेहरा दे दो
और
गुलज़ार तुम जिंदा रहो
क्यों कि तुमने जिंदा रहना है
और सिर्फ जिंदा रहना है .. .. !!!!!

21 comments:

  1. गुलज़ार तो बस गुलज़ार हैं दुआ है हमेशा गुलज़ार रहें.

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  2. शब्दों की तस्वीर को इतने मनोयोग से बनाया है कि न आँखें हटती हैं , न सोच ..... सबकुछ गुलजारमय ! कोई भी व्यक्ति सिर्फ वह नहीं होता जो रंगमंच पर उतरता है , अनुरोध पर गानेवाला ज़रूरी नहीं कि उस वक़्त गाने की स्थिति में हो ...... इसे समझनेवाले बिरले होते हैं

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  3. यह एक बेहतरीन आरम्भ है ....

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  4. शब्दचित्र के माध्यम से जैसे आपने समंदर की गहराई नाप ली...!

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  5. बड़ी सादगी से जीने वाले बड़े छोटे का भेदभाव न कर सबसे हिल मिल चलने वाले बिरले होते है और इसमें गुलजार साहब का नाम सर्वोपरि है.. उनके गीत मन की अतल गहराई को छू जाते हैं ... वे हमेशा स्वस्थ रहे यही शुभकामना हमारी भी है... आपने अपने ब्लॉग लेखन से शुरुवात बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत की, यह देखकर बहुत अच्छा लगा...
    हार्दिक शुभकामनाओं सहित.. सादर

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  6. अति सुंदर...... अनुपम शब्द संयोजन ....

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  7. हमेशा गुलजार रहें ,,,,
    बहुत सुंदर बेहतरीन प्रस्तुति ,,,,,
    समर्थक बने तो मुझे खुशी होगी ,,,,

    अपने कमेन्ट बाक्स से वर्डवेरीफिकेसन हटा ले,कमेंट्स करने में परेशानी और समय बर्बाद होता है

    RESENT POST ,,,, फुहार....: प्यार हो गया है ,,,,,,

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  8. ek-ek shabd
    aapko aur aapki rachna-kshamataa ko
    rekhaankit kar rahaa hai ...
    badhaaee svikaareiN .

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  9. गुलज़ार जी की ओर दीवानगी और बढ़ गयी इस रचना को पढ़ कर.....

    बहुत सुंदर.
    अनु

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  10. http://urvija.parikalpnaa.com/2012/06/blog-post.html

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  11. गुलज़ार एक ऐसा शख्स जिसकी नज़्में जिन्दगी-सी जीती हैं, जीवन हो कि सिनेमा कुछ ऐसी की सीधे अंतर्मन को टटोलती है. एक शायर और फिल्म निर्माता के रूप में गुलज़ार को मैं उतना ही जानती हूँ जितना कोई एक आम आदमी, पर गुलज़ार को समर्पित आपकी रचना और आपकी दीवानगी से गुलज़ार को और जानने की इच्छा हो रही है. यूँ आपकी रचना से गुलज़ार के उन अनकहे पहलू को भी समझ रही जो शायद उनकी नज्मों में नहीं उतरता है. आपकी लेखनी, दीवानगी और कार्यशीलता यूँ ही बनी रहे, बहुत शुभकामनाएँ.

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  12. मेरे ब्लॉग में आकर मेरा हौसला बढ़ाने वाले सरे दोस्तों का बहुत आभारी हूँ , कोशिश करूंगा आप सब के साथ मेरा साथ ऐसे ही बना रहे.|

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  13. वाह ..कितनी शिद्दत से आपने गुलज़ार साहब का ज़िक्र किया ....काबिले तारीफ है आपकी भावना ...
    बहुत अच्छा लगा आपकी पोस्ट पढ़ कर ...!!
    शुभकामनायें ...!!

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  14. bahut sundar sir...blog jagat mein shubh swagat...

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  15. गुलज़ार तुम जिंदा रहो
    आने वाले कल के लिए
    जाती हुई लहर के लिए
    सुलगते आसमान के लिए .......100%agree....

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  16. अमृत की चाहत लिए तो नहीं आई थी पर अमृत सा ही मिला आपके द्वारा गुलजार साहब को पढ़कर.

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  17. बहुत सुन्दर...कविता के साथ-साथ परिचय पढ़ना भी अच्छा अनुभव रहा. शुभकामनायें!!

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  18. शायद कोई भी नहीं जनता
    पिघल कर कागजों पर फैली आग
    खेतों में बोए अधनंगे चिहरे वाले बीज
    पतझड़ में खुंदक कर लौटी आवाज़
    ऊँची पहाड़ी पर हंसती हरिआवल
    ठंडी हवा में सुनाई देने वाली
    सीटी का नाम हो सकता है

    सुन्दर कविता,

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  19. इक इमरोज़ की दीवानी इक गुलज़ार का दीवाना .......:))
    क्या बात है......
    आपकी ये नज़्म पहले भी पढ़ी थी ..आपके शब्दों में वही जादू है जो कि गुलज़ार साहब की शख्सियत में ....
    इसलिए मोहब्बत से जुड़े शब्दों से बनी ये तस्वीर भी ऐसी तस्वीर है जों सीधे किसी के भी दिल में उतर जाये .....
    आपकी दीवानगी में हम भी शामिल हैं ....
    गुलज़ार जी को हमारा नमन .....!!

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  20. इबारत बैठती है लिबास कि तरह
    अपने उपर ओढ़ता है वो चांदनी


    गुलजार तो बस गुलजार हैं.....

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  21. मेरे पसंदीदा शायर पर इतनी खूबसूरत पेशकश के लिए शुक्रिया !
    आभार .

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!! एहसासों का सागर !!: जब चन्दा को मिली चाँदनी, पूरण चाँद कहाया।।

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