Monday, 3 September 2018

या खुदा / गुरप्रीत कौर

हाथों की अँगुलियों के छोर पर उकरी है
कोई गाथा
दिल की धड़कन में उठा है
कोई बवाल
फिर पैरों से सुनाई दी है
घुंघरुओं की आवाज़
कानों को सुन रहे हैं
नाचते हुए साज़
आंख में हो रहा है
कोई महा नृत्य

या खुदा
ये तेरे कौन नाटक का अध्याय है
या मेरी ज़िंदगी का कौन सा परिदृश्य  ....... !

                                                                                                  अनुवाद - दर्शन दरवेश 

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Sunday, 8 April 2018

पंजाबी कविता / जोगन / विपन गिल / अनुवाद - दर्शन दरवेश

उसने कहा
तुम कभी मत आना
इन दर दरवाज़ों पर
न जोगी बन
न भोग विलासी बन
जा किसी और दर पर जा
और अपनी अलख जगा
पर , मैं हूँ कि  ....
हर वर्ष आता हूँ
बारिश के भीगे मौसम में
पानी का तुपका बन
अलख जगाता हूँ
उसके घर आँगन में
जोगी बन
मस्ती मस्त नाचता हूँ
बैठ जाता हूँ जरा सा
उसकी हथेलियों पर
और छूह लेता हूँ
उसके बदन को
मन की महकती मिट्टी संग
और वो नाच उठती है
जोगन बन  ....
जोगन बन   ....... !

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Friday, 2 March 2018

पंजाबी कविता / सपने / दर्शन दरवेश - हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

सपनों पर किसी का हक़ नहीं होता
मुंडरों पर
बत्तियाँ बुझ जाती हैं
पानी का पर्वत बन जाता है
आँसू नीले हो जाते हैं
घने कोहरे में
पंछियों की आँख नहीं खुलती
कोई बिन बताए अंदर आ जाता है
पूछने पर कहता है –
सपनों पर किसी का हक़ नहीं होता
मैंने पहाड़ों में
समुंदर सिरज लिया
अपनी चुप का अँधेरा
बादलों के हवाले कर दिया
किसी के धुंधले अक्स को
कैनवस समझ लिया
गुलाब का चित्र बनाना था
पोहली1 के बीज छिड़क बैठा
पानी की लहर आई
उसकी आँखें खाली हो गईं
मेरी नज़र में
रेत भर गयी 
पानी दोनों के पास नहीं था
मैं दूर न जा सका
वह करीब न आ सका
कैनवस बोल रही थी
सपनों पर सचमुच किसी का हक़ नहीं होता !
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(1-कांटेदार पौधा)
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

Monday, 12 February 2018

"गाजर घास" / बलदेव कृष्ण शर्मा / अनुवाद - दर्शन दरवेश

"गाजर घास" / बलदेव कृष्ण शर्मा / अनुवाद - दर्शन दरवेश

मैं तेरे फ़लने फूलने पर
तुझे दाद देता हूँ
और विरोधी मौसम में,
जीने के हठ के लिए,
सलाम भी करता हूँ

बेशक,
ऋणात्मक पासार
कभी उपयोगी नहीं होते ,
लेकिन मुझे प्रभावित करता है
तेरा फलने फूलने पर आधारित
अपने उदेश्य के लिए
जीवित रहने का फलसफा


तेरा हठी स्वभाव
बहुत बड़ी शर्मिंदगी है,
नदीन नाशिकों के लिए

खेतों खलिहानों रास्तों में
जहाँ भी तेरे बीज गिरे हैं
तू वहीँ पैदा हो कर
फ़ैल गयी है

शायद,
तुम्हें नदीन कहना भी ठीक नहीं होगा
बेरहम नशीले पदार्थों के लिए,
तुझे अलग करता है
गिल्ली डंडा और इट सिट की श्रेणी से
क्योंकि वो भारतीय हो कर
अपनी फसलों का गला घोंटती हैं
और तुम
विदेशी हो कर
हमारी फसलों की नस्लों को मरती हो
और हम
तुम्हारी मेहमान नवाज़ी के लिए
पहले से ही,
आंखें झुका कर
आपका स्वागत करने की
आदत डाल चुके हैं
ये अलग बात है
तुम हमारा फायदा करती हो या नुकसान  .....?

                                                                          *****

(लेखक ज़िला  अमृतसर पंजाब में रहते है।  हर कविता मुद्दा प्रधान होती है।  नौकरी पेशा हैं।  बाकी  अपने बारे में वो खुद ज्यादा बता सकते हैं , अगर आप पूछोगे} 

Saturday, 20 January 2018

गुम हुआ घर / दर्शन दरवेश

दुनिया का मेला
और उस मेले में
एक गुम हुआ घर

कभी कभार
एक दर्द उठता है छाती में 
जब लोगों की भीड़
मिस्ठान की दुकानों
कबड्डी के मैच
बीर रस के क़िस्से
और
मिर्जा-साहिबां गाते
लोक गायकों की तरफ़ उमड़ पड़ती
धूल की एक धुंदली सी 
दीवार के उस पार
स्पष्ट नज़र आता है
तीस साल पहले बना एक घर
और मेरी मां

माँ ..
चली आ रही है
रोटी पर एक गुड़ रख कर
भीड़ में मुझे
उंगली पकड़ कर
चलने को कहती है
..
..
ना मैं भटका
ना मैं गुम होया
बस एक घर खो दिया है
उस मेले में मैं
जिसको आज भी तलाश रहा हूँ  ....
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Sunday, 14 January 2018

चिट्ठीयां / स्वर्णजीत सवी / अनुवाद - दर्शन दरवेश

चिट्ठीयां   / स्वर्णजीत सवी

भोज पत्रों पर बैठकर
ताबीज़ में बंद संदेशे
कबूतरों के पाँव में बांधे
उनकी लम्बी उडारी
इंतज़ार करती आँखों को ठंडक पहुंचाती

चिट्ठियां सफ़र  करती
अँगुलियों की छोह संभाल कर
लाल डिब्बों में छिपकर
दूर दराज़ का सफ़र खंगालती
उत्सुक मनों को ठंडक पहुंचाती

टिक टिक करती
फिर से लिखती
मन की वेदना
दौड़ में शामिल
टेलीग्राम का जनम
अति ख़ुशी या फिर
गहरी उदासी बांटती

की बोर्ड पर पोटे लिखते
दिल की कहानी
सीधी  जाती
इनबॉक्स या ईमेल में

'हाय' 'हेलो' कहकर खुलती
चैट बॉक्स की खिड़कीयां
तुरंत मांगें जवाब
और पढ़ भी लें
आपके चेहरे के उतार चढाव  .....

भोज पत्तरों से चाट बॉक्स तक
चिट्ठियां तो चिट्ठीयां ही रहती हैं
कुछ रेशमी गरूर से भरी हुई
या बैठ जाएं
अंदर संदूकों (ट्रंक) के डायरी की तरह
या दिलों के अंदर
उनको संभलना तो
इनबॉक्स में ही है

कुछ वर्जित, चाहत से दूर
या
फिटकारी चिट्ठियां
कभी ना पार  करें
दिलों की दहलीज़

तीला  तीला  बिखर जाएं
ट्रैश स्पैम की गवाही भरवाकर
मिट जाएं हमेशा हमेशा के लिए
गुम  जाएं गहरे अँधेरे में

चिट्ठियां तो बस चिट्ठियां होती हैं
भोज पत्तरों पर हों या चैट  बॉक्स में  .....

(सवर्णजीत सवी पंजाबी का समान्तर शायर , चित्रकार , डिज़ाइनर , प्रकाशक , फोटोग्राफर है।  ) 

Thursday, 4 January 2018

नीलू हर्ष की 10 कविताएं / हिंदी अनुवाद - दर्शन दरवेश

NEELU HARSH

चल समंदर पे रेत का घर बनाएं 
तू छत पकड़ना 
मैं पांव नहीं निकालूंगी  
इस बार मत तोडना , कह देती हूँ 
घरौंदे नहीं बनते  .... मकान बन जाते हैं  .... 


ओ मुसाफिर 
मेरे शहर की आबो हवा में खुमारी है 
जब से 
तेरी खुशबु हवा ने चुरा ली है  ..... 


ओंस की बूँद , हाथ में तेरे 
सिर झुका कर चूमा 
रकीबों ने देखा और मेरी पलकों पर आ गयी  ..... 


हाथों से छूह कर उसे 
श्वासों में भर लिया 
रूह में घुल गया 
स्पर्श में उतर  गया  ... 


मौसम तेवर बदलता है 
हवा रुख बदलती है 
आज चमकती धुप है 
कल छाँव का सुख मिलेगा  ..... 


सारी  रात सुलगते तारे 
अब भी धीमी धीमी लो 
शायद चन्द्रमा को गुजरिश करते 
थोड़ा थोड़ा कुछ पल रुक जा और  ..... 


मन 
पहले मैं समझाती थी तुम्हें 
अब तुमने मुझे समझा लिया 
बस 
मैं हारी 
तुम जीत गए 
ये भेद मैंने पा लिया  ..... 


चमकती आँखों में 
कुछ नमी भी रखती हूँ 
उदासी का चन्द्रमा 
पूछ कर दस्तक नहीं देता  ..... 


मैं दरिया नहीं 
किनारा बनूँगी 
लहरों से खेलता मेरे तक आया 
फिर तो ठीक 
मुझे धकेल कर आगे बढ़ा 
ज़ालिम  .. बर्दाश्त ना  करूंगी  ..... 

10 
कभी तुम बने आदत मेरी 
कभी बेवजह शिरकत तेरी 
रिश्ता हो तो ऐसा ही हो 
ना रंज तुझे 
ना  मैं करूँ शिकायत तेरी  ..... 

(नीलू हर्ष पेशे से वकील है और सवभाव से ज़िंदादिल।  रुपनगर पंजाब में रहती हैं)

MY SONG

या खुदा / गुरप्रीत कौर

हाथों की अँगुलियों के छोर पर उकरी है कोई गाथा दिल की धड़कन में उठा है कोई बवाल फिर पैरों से सुनाई दी है घुंघरुओं की आवाज़ कानों को सुन...

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